हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , क्षेत्र में हालिया जंग के बाद एक स्पष्ट परिवर्तन देखने को मिल रहा है। एक ओर ईरान ने अपनी रक्षा प्रणाली में काफी आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है, वहीं दूसरी ओर इज़राइल में निराशा और अस्थिरता बढ़ती जा रही है। यह बदलती स्थिति केवल सैन्य शक्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक और जनता के स्तर पर भी असर डाल रही है।
ईरान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अब देश एक हज़ार से अधिक प्रकार के हथियार खुद बना रहा है, जिनमें मिसाइलें, ड्रोन और अन्य आधुनिक उपकरण शामिल हैं। इसका मतलब है कि ईरान ने पिछले कई वर्षों में अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत किया है।
खास बात यह है कि यह प्रणाली केवल एक स्थान पर केंद्रित नहीं है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई है, ताकि यदि कहीं नुकसान भी हो, तो काम जारी रह सके। इसमें हज़ारों सरकारी और निजी संस्थान भी शामिल हैं, जो इस प्रणाली को और मजबूत बनाते हैं।
दूसरी ओर, इज़राइल के अंदर स्थिति अलग है। हाल के सर्वेक्षण बताते हैं कि वहाँ के लोगों का अपनी सेना और युद्ध सफलताओं पर भरोसा कम हो गया है। पहले जो लोग समझते थे कि ईरान को बड़ा नुकसान पहुँचा है, अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है।
इसी तरह देश के अंदर खुद को सुरक्षित महसूस करने का एहसास भी कम हुआ है। विशेष तौर पर लेबनान की ओर से खतरे का अहसास बढ़ गया है, जिससे लगता है कि इज़राइल एक से अधिक मोर्चों पर दबाव में है।
युद्ध का असर आम लोगों पर भी पड़ा है। ईरान में शहीद होने वालों में बड़ी संख्या आम नागरिकों की है, और जो इमारतें प्रभावित हुई हैं, उनमें भी अधिकतर आम लोगों के घर और कारोबार शामिल हैं। इससे पता चलता है कि युद्ध का बोझ आम जनता पर भी पड़ रहा है।
लेबनान में हिजबुल्लाह ने भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि युद्धविराम का उल्लंघन किया गया तो वह जवाब देगा। हालिया कार्रवाइयों से पता चलता है कि यह मोर्चा अभी भी सक्रिय है और इज़राइल के लिए चुनौती बना हुआ है।
इन परिस्थितियों के बावजूद ईरान में रोज़मर्रा की ज़िंदगी जारी है। हज के लिए तीर्थयात्रियों को भेजने का फैसला इस बात का संकेत है कि देश सामान्य स्थिति बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो युद्ध के बाद धीरे-धीरे स्थितियाँ बदल रही हैं। ईरान मजबूत दिख रहा है, जबकि इज़राइल के अंदर बेचैनी और अनिश्चितता बढ़ती जा रही है।
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